Saturday, February 4, 2017

कोउ नृप होइ हमें का हानि

कोउ नृप होइ हमें का हानि

हम दरिद्र हैं भूखे नंगे, ना खाना पीने को पानी I
दशकों से हैं इसी दशा में, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

सत्तर साल भई आज़ादी, भये बहुत राजा और रानी
रहे तरसते दो टुकड़ो को, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

कीड़ो सा हैं जीवन अपना, जीते नहीं मौत ना आनी
जीवन मरण मुक्त हैं हम तो, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

सबने अपनी जेबें भर ली, घोटालों की लिखी कहानी
हम पर कोई तरस ना खावे, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

राजनीति की रोटी खाकर, इनका खून बन गया पानी
हमें समझते वस्तु सभी ये, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

पांच वर्ष में एक बार ही, इनको हमरी याद है आनी
हाथ जोड़कर वोट मांगते, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

काल कराल है नियति अपनी, भूख प्यास प्रतिदिन की मानी
भोजन ही मुश्किल से मिलता, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

भये हजारों कोर्ट मुक़दमे, नेता ने कभी सजा ना पानी

खून चूसते हम जीवो का, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

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