Saturday, February 4, 2017

कोउ नृप होइ हमें का हानि

कोउ नृप होइ हमें का हानि

हम दरिद्र हैं भूखे नंगे, ना खाना पीने को पानी I
दशकों से हैं इसी दशा में, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

सत्तर साल भई आज़ादी, भये बहुत राजा और रानी
रहे तरसते दो टुकड़ो को, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

कीड़ो सा हैं जीवन अपना, जीते नहीं मौत ना आनी
जीवन मरण मुक्त हैं हम तो, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

सबने अपनी जेबें भर ली, घोटालों की लिखी कहानी
हम पर कोई तरस ना खावे, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

राजनीति की रोटी खाकर, इनका खून बन गया पानी
हमें समझते वस्तु सभी ये, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

पांच वर्ष में एक बार ही, इनको हमरी याद है आनी
हाथ जोड़कर वोट मांगते, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

काल कराल है नियति अपनी, भूख प्यास प्रतिदिन की मानी
भोजन ही मुश्किल से मिलता, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

भये हजारों कोर्ट मुक़दमे, नेता ने कभी सजा ना पानी

खून चूसते हम जीवो का, कोउ नृप होइ हमें का हानि II

Friday, July 10, 2015

बूँद फिर आकाश से, आकर गिरी देखो कहाँ ।
बचपनों की वो शरारत, ढूँढता फिरता यहाँ।।
बारिशों के रास्तों पर, डगमगाती कश्तियां।
काग़ज़ों की थीं मगर, करतीं मेरे दिल का बयां।।
ख़ुशबू सोंधे खेत की, मुझको अभी तक याद है।
चहचहाना पक्षियों का, दिल में वो झंकार है।।
टीन की छत ज्यूं बजी दिल का भी कोना बज उठा।
जलतरंगे पड़ रही, है सुर नया सा सज उठा।।
हर तरफ़ हरियालियों से भरा वो संसार था।
प्रकृति का बनाया ये हरा एक कैनवास था।।
घुमडते वो काले बादल, दिल के कितने पास थे।
गाँव के वो कच्चे पथ, उनमें ही मेरे श्वास थे।।
शहर आकर खो गया है, दिल का एक हिस्सा मेरा।
भूल आया गाँव में, शायद कहीं बिखरा पड़ा ।।
घर गृहस्थी की पड़ी हैं, पाँव में जो बेड़ियाँ।
हैं कहाँ वो बालपन की, सुलभता वो मस्तियाँ।
काश बीते दिन मेरे वो, कोई लौटा दे कभी।
काश गलियाँ गाँव की, पाँवों तले आएँ कभी।।
खोजता हूँ खेत, नदियाँ, पेड़ और खलिहान को।
खोजता हूँ माँ का आँगन, बाग़ और बाग़ान को।।
इन्द्र के दूतों सुनो, यह एक मेरी याचना।
जा रहे उस ओर तुम, मेरी है ये अभ्यर्थना।।
मेरे बचपन की धरा को एक देना सूचना।
याद है मेरी उसे, चाहूँ यही बस पूछना।।
अमित बंसल

Saturday, May 30, 2015

आम आदमी की ज़िन्दगी

खो चुका हूँ भीड़ में, अब नाम तक है लापता।
बन गया हिस्सा इसी का, ख़ुद नहीं ख़ुद का पता।।
ज़िन्दगी की कश्मकश में, बह गया जाने किधर।
भीड़ में ही चल रहा, लेकर चली मुझको जिधर।।
सुबह से फिर शाम होती, सूर्य ढल जाता कहीं।
दिन छिपा और टूट कर के मैं भी गिर जाता यहीं।।
भूल अपनी शख़्सियत, क्या बन गया हूँ मैं अभी।
यंत्रचालित काम करना, नियति ही मेरी रही।।
वापसी जब लौटता, रहता हृदय में भय सदा।
घर की वो फ़रमाइशें पूरी भी होंगी क्या पता।।
घर गृहस्थी में फँसा, मैं एक निर्जन प्राण हूँ।
रात दिन को एक करके, ख़ुद बना निष्प्राण हूँ।।
खोजता हूँ राह कोई, मुझको मिल जाए कहीं।
मेरी ख़ुशियाँ फिर कहीं से, लौट आ जाएँ यहीं।।
आम जन की ये व्यथा, कोई समझ न पाएगा।
इसके जीवन चक्र में कोई न अन्तर आएगा।।

AMIT BANSAL

भूख

आसमां से कोई जैसै, आग है बरसा रहा।
जेठ की तपती दुपहरी, सूर्य सर पर आ रहा।।
फूस के छप्पर तले कुछ जिन्दगानी खेलतीं।
चपल चंचलता दिखातीं, मुस्करातीं मचलतीं।।१।।
बालपन की सुलभता, अपने में ही कुछ मस्त है।
माँ लिए आँसू नयन में, लग रही कुछ त्रस्त है।।
दिन चढ़ा और चढ़ के बीता, क्या करूँ न सूझता।
आज फिर से काम ना होना, समय है जूझता।।२।।
भूख का उत्तर कोई, कोई दिखा दे रास्ता।
बात से तो पेट का कोना नहीं भरता यहाँ।।
माँ पिता मन मार कर के दिन बिता सकते यहाँ।
भूख से बच्चे बिलखते, उन्हें ले जाएँ कहाँ।।३।।
कहीं पर सम्पन्न जन के श्वान बिस्कुट खा रहे।
कहीं पर चूल्हे चढ़े, पत्थर उबलते ही रहे।।
क्या करें कैसै करें, ईश्वर ही है अब लापता।
कोई कह दे या बता दे, इनको मृत्यु का पता।।४।।
क्यों बनाई विषमता, सम्पन्न और दुर्घर्ष की।
क्यों बनाई विषमता, दुख दर्द और श्री हर्ष की।।
नियति का ये खेल जिसमें कष्ट ऐसा दे दिया।
है उदर पर उसको भरने के लिए कुछ न दिया।।५।।
हे प्रभो तुम शक्तिशाली कुछ करो इस स्रष्टि का।
भेद मिट जाएँ धरा से, हो समय सुख वृष्टि का।।
भूख का सब कुछ मिटा दो अपने शब्दों कोष से।
हों सुखी सब जन धरा पर, न रहे कोई रोष से।।६।।
हर तरफ़ सम्पन्नता हो, दुग्ध सरिता भी बहें।
किसी माँ का लाड़ला, भूखा कभी भी न रहे।।
विश्वगुरु हो देश भारत जैसै पहले था कभी।
स्वर्ण चिड़िया फिर बनाकर दिखा दो सबको अभी।।७।।
अमित बंसल

Tuesday, May 19, 2015

तुम कहाँ खो गए

दूर तुम आकाश से, देखो मुझे चाहे जभी।
करता हूँ महसूस मेरे पास में तुमको अभी।।
तुम बिना जीवन में कुछ अच्छा नहीं है।
आँख का वो कोर भी सूखा नहीं है।।१।।
साथ खेले थे कभी हम एक ही आँगन तले।
माँ पिता के प्यार से हम साथ ही फूले फले।।
वो तुम्हारा डाँटना भूला नहीं है।
आँख का वो कोर भी सूखा नहीं है।।२।।
वो तुम्हारा झगड़ना और वो उलाहने हैं कहाँ।
तरसता हूँ उन्हीं पल को दिल में लेकर के यहाँ।।
क्यूँ तुम्हारा साथ अब मिलता नहीं है।
आँख का वो कोर भी सूखा नहीं है।।३।।
बालपन की सुलभ यादें, वो तुम्हारा हाथ था।
घर में सब हों रूष्ट फिर भी एक तेरा साथ था।।
दिल में हरदम शून्य सा लगता कहीं है।
आँख का वो कोर भी सूखा नहीं है।।४।।
वो शरारत वो मचलना, साथ तेरे खेलना।
एक पल में खो गया जाने कहाँ वो बचपना।।
आज भी आँगन पड़ा सूना वहीं है।
आँख का वो कोर भी सूखा नहीं है।।५।।
अमित बंसल

नई सुबह

सूर्य की पहली किरण ज्यों छा रही है।
यूँ मचलती, यूँ ठिठकती आ रही है।।
धरा से ये तिमिर अब मिटने लगा है।
रात की वो धूल काली जा रही है।।१।।
घास पर वो ओस की बूँदें निराली।
प्रकृति ख़ुद गुनगुनाती जा रही है।।
पेड के पत्ते मचल कर कह रहे हैं।
एक और वासंत उषा आ रही है।।२।।
एक चादर लाल सी धरती पे छाई।
नई सुबह का संदेशा ला रही है।।
शाख़ पर कोयल सुहानी बैठ कर यूँ।
उठ मनुष, कर जत्न ऐसा गा रही है।।३।।
उठ चलो, उद्यम करो, एक नया दिन है।
सफलता के चरण चुम्बन के लिए तू।।
पग बढ़ा, संघर्ष कर, ये दिन है तेरा।
एक और जीने की वजह आ रही है।।४।।

Amit Bansal

बूँद की व्यथा

सूर्य की पहली किरण में टिमटिमातीं। 
चाँदनी की रश्मियों सी चमचमातीं।।
बह रही जब पवन पत्तों के शिखर से। 
यूँ दिये की लौ के जैसी थरथरातीं।।
स्वाति की अद्भुत छटा में बरस कर तुम।
सीप में गिरकर वहाँ मोती बनातीं।।
जब गिरो आकाश से झरने की तरह।
कृषक जन के प्राण पण में प्राण लातीं।।
सुख में तुम हो, दुख में भी अच्छा विषय है।
आँख की कोरों को भी गीला बनातीं।।
प्रकृति के रौद्र रूपों में भी तुम हो।
संघनित हो तुम धरा पर प्रलय लातीं।।
हर्ष तुम हो, दुख तुम्हीं और रोष तुम हो।
प्राण के चक्रों को बस तुम ही चलातीं।।
पर व्यथा इस बूँद की मैं क्या बताऊँ।
पलों में ये वाष्प बन अदृश्य जातीं।।
बूँद और जीवन हैं दोनों एक जैसै।
व्यथा दोनों ही की देखो मिट न पाती।।
पर बनाया प्रकृति ने इस तरह से।
बूँद के दिल की न भाषा समझ आती।।


Amit Bansal