आसमां से कोई जैसै, आग है बरसा रहा।
जेठ की तपती दुपहरी, सूर्य सर पर आ रहा।।
फूस के छप्पर तले कुछ जिन्दगानी खेलतीं।
चपल चंचलता दिखातीं, मुस्करातीं मचलतीं।।१।।
जेठ की तपती दुपहरी, सूर्य सर पर आ रहा।।
फूस के छप्पर तले कुछ जिन्दगानी खेलतीं।
चपल चंचलता दिखातीं, मुस्करातीं मचलतीं।।१।।
बालपन की सुलभता, अपने में ही कुछ मस्त है।
माँ लिए आँसू नयन में, लग रही कुछ त्रस्त है।।
दिन चढ़ा और चढ़ के बीता, क्या करूँ न सूझता।
आज फिर से काम ना होना, समय है जूझता।।२।।
माँ लिए आँसू नयन में, लग रही कुछ त्रस्त है।।
दिन चढ़ा और चढ़ के बीता, क्या करूँ न सूझता।
आज फिर से काम ना होना, समय है जूझता।।२।।
भूख का उत्तर कोई, कोई दिखा दे रास्ता।
बात से तो पेट का कोना नहीं भरता यहाँ।।
माँ पिता मन मार कर के दिन बिता सकते यहाँ।
भूख से बच्चे बिलखते, उन्हें ले जाएँ कहाँ।।३।।
बात से तो पेट का कोना नहीं भरता यहाँ।।
माँ पिता मन मार कर के दिन बिता सकते यहाँ।
भूख से बच्चे बिलखते, उन्हें ले जाएँ कहाँ।।३।।
कहीं पर सम्पन्न जन के श्वान बिस्कुट खा रहे।
कहीं पर चूल्हे चढ़े, पत्थर उबलते ही रहे।।
क्या करें कैसै करें, ईश्वर ही है अब लापता।
कोई कह दे या बता दे, इनको मृत्यु का पता।।४।।
कहीं पर चूल्हे चढ़े, पत्थर उबलते ही रहे।।
क्या करें कैसै करें, ईश्वर ही है अब लापता।
कोई कह दे या बता दे, इनको मृत्यु का पता।।४।।
क्यों बनाई विषमता, सम्पन्न और दुर्घर्ष की।
क्यों बनाई विषमता, दुख दर्द और श्री हर्ष की।।
नियति का ये खेल जिसमें कष्ट ऐसा दे दिया।
है उदर पर उसको भरने के लिए कुछ न दिया।।५।।
क्यों बनाई विषमता, दुख दर्द और श्री हर्ष की।।
नियति का ये खेल जिसमें कष्ट ऐसा दे दिया।
है उदर पर उसको भरने के लिए कुछ न दिया।।५।।
हे प्रभो तुम शक्तिशाली कुछ करो इस स्रष्टि का।
भेद मिट जाएँ धरा से, हो समय सुख वृष्टि का।।
भूख का सब कुछ मिटा दो अपने शब्दों कोष से।
हों सुखी सब जन धरा पर, न रहे कोई रोष से।।६।।
भेद मिट जाएँ धरा से, हो समय सुख वृष्टि का।।
भूख का सब कुछ मिटा दो अपने शब्दों कोष से।
हों सुखी सब जन धरा पर, न रहे कोई रोष से।।६।।
हर तरफ़ सम्पन्नता हो, दुग्ध सरिता भी बहें।
किसी माँ का लाड़ला, भूखा कभी भी न रहे।।
विश्वगुरु हो देश भारत जैसै पहले था कभी।
स्वर्ण चिड़िया फिर बनाकर दिखा दो सबको अभी।।७।।
किसी माँ का लाड़ला, भूखा कभी भी न रहे।।
विश्वगुरु हो देश भारत जैसै पहले था कभी।
स्वर्ण चिड़िया फिर बनाकर दिखा दो सबको अभी।।७।।
अमित बंसल
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