Tuesday, May 19, 2015

नई सुबह

सूर्य की पहली किरण ज्यों छा रही है।
यूँ मचलती, यूँ ठिठकती आ रही है।।
धरा से ये तिमिर अब मिटने लगा है।
रात की वो धूल काली जा रही है।।१।।
घास पर वो ओस की बूँदें निराली।
प्रकृति ख़ुद गुनगुनाती जा रही है।।
पेड के पत्ते मचल कर कह रहे हैं।
एक और वासंत उषा आ रही है।।२।।
एक चादर लाल सी धरती पे छाई।
नई सुबह का संदेशा ला रही है।।
शाख़ पर कोयल सुहानी बैठ कर यूँ।
उठ मनुष, कर जत्न ऐसा गा रही है।।३।।
उठ चलो, उद्यम करो, एक नया दिन है।
सफलता के चरण चुम्बन के लिए तू।।
पग बढ़ा, संघर्ष कर, ये दिन है तेरा।
एक और जीने की वजह आ रही है।।४।।

Amit Bansal

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