खो चुका हूँ भीड़ में, अब नाम तक है लापता।
बन गया हिस्सा इसी का, ख़ुद नहीं ख़ुद का पता।।
बन गया हिस्सा इसी का, ख़ुद नहीं ख़ुद का पता।।
ज़िन्दगी की कश्मकश में, बह गया जाने किधर।
भीड़ में ही चल रहा, लेकर चली मुझको जिधर।।
भीड़ में ही चल रहा, लेकर चली मुझको जिधर।।
सुबह से फिर शाम होती, सूर्य ढल जाता कहीं।
दिन छिपा और टूट कर के मैं भी गिर जाता यहीं।।
दिन छिपा और टूट कर के मैं भी गिर जाता यहीं।।
भूल अपनी शख़्सियत, क्या बन गया हूँ मैं अभी।
यंत्रचालित काम करना, नियति ही मेरी रही।।
यंत्रचालित काम करना, नियति ही मेरी रही।।
वापसी जब लौटता, रहता हृदय में भय सदा।
घर की वो फ़रमाइशें पूरी भी होंगी क्या पता।।
घर की वो फ़रमाइशें पूरी भी होंगी क्या पता।।
घर गृहस्थी में फँसा, मैं एक निर्जन प्राण हूँ।
रात दिन को एक करके, ख़ुद बना निष्प्राण हूँ।।
रात दिन को एक करके, ख़ुद बना निष्प्राण हूँ।।
खोजता हूँ राह कोई, मुझको मिल जाए कहीं।
मेरी ख़ुशियाँ फिर कहीं से, लौट आ जाएँ यहीं।।
मेरी ख़ुशियाँ फिर कहीं से, लौट आ जाएँ यहीं।।
आम जन की ये व्यथा, कोई समझ न पाएगा।
इसके जीवन चक्र में कोई न अन्तर आएगा।।
इसके जीवन चक्र में कोई न अन्तर आएगा।।
AMIT BANSAL
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