Tuesday, May 19, 2015

बूँद की व्यथा

सूर्य की पहली किरण में टिमटिमातीं। 
चाँदनी की रश्मियों सी चमचमातीं।।
बह रही जब पवन पत्तों के शिखर से। 
यूँ दिये की लौ के जैसी थरथरातीं।।
स्वाति की अद्भुत छटा में बरस कर तुम।
सीप में गिरकर वहाँ मोती बनातीं।।
जब गिरो आकाश से झरने की तरह।
कृषक जन के प्राण पण में प्राण लातीं।।
सुख में तुम हो, दुख में भी अच्छा विषय है।
आँख की कोरों को भी गीला बनातीं।।
प्रकृति के रौद्र रूपों में भी तुम हो।
संघनित हो तुम धरा पर प्रलय लातीं।।
हर्ष तुम हो, दुख तुम्हीं और रोष तुम हो।
प्राण के चक्रों को बस तुम ही चलातीं।।
पर व्यथा इस बूँद की मैं क्या बताऊँ।
पलों में ये वाष्प बन अदृश्य जातीं।।
बूँद और जीवन हैं दोनों एक जैसै।
व्यथा दोनों ही की देखो मिट न पाती।।
पर बनाया प्रकृति ने इस तरह से।
बूँद के दिल की न भाषा समझ आती।।


Amit Bansal

No comments:

Post a Comment