बूँद फिर आकाश से, आकर गिरी देखो कहाँ ।
बचपनों की वो शरारत, ढूँढता फिरता यहाँ।।
बचपनों की वो शरारत, ढूँढता फिरता यहाँ।।
बारिशों के रास्तों पर, डगमगाती कश्तियां।
काग़ज़ों की थीं मगर, करतीं मेरे दिल का बयां।।
काग़ज़ों की थीं मगर, करतीं मेरे दिल का बयां।।
ख़ुशबू सोंधे खेत की, मुझको अभी तक याद है।
चहचहाना पक्षियों का, दिल में वो झंकार है।।
चहचहाना पक्षियों का, दिल में वो झंकार है।।
टीन की छत ज्यूं बजी दिल का भी कोना बज उठा।
जलतरंगे पड़ रही, है सुर नया सा सज उठा।।
जलतरंगे पड़ रही, है सुर नया सा सज उठा।।
हर तरफ़ हरियालियों से भरा वो संसार था।
प्रकृति का बनाया ये हरा एक कैनवास था।।
प्रकृति का बनाया ये हरा एक कैनवास था।।
घुमडते वो काले बादल, दिल के कितने पास थे।
गाँव के वो कच्चे पथ, उनमें ही मेरे श्वास थे।।
गाँव के वो कच्चे पथ, उनमें ही मेरे श्वास थे।।
शहर आकर खो गया है, दिल का एक हिस्सा मेरा।
भूल आया गाँव में, शायद कहीं बिखरा पड़ा ।।
भूल आया गाँव में, शायद कहीं बिखरा पड़ा ।।
घर गृहस्थी की पड़ी हैं, पाँव में जो बेड़ियाँ।
हैं कहाँ वो बालपन की, सुलभता वो मस्तियाँ।
हैं कहाँ वो बालपन की, सुलभता वो मस्तियाँ।
काश बीते दिन मेरे वो, कोई लौटा दे कभी।
काश गलियाँ गाँव की, पाँवों तले आएँ कभी।।
काश गलियाँ गाँव की, पाँवों तले आएँ कभी।।
खोजता हूँ खेत, नदियाँ, पेड़ और खलिहान को।
खोजता हूँ माँ का आँगन, बाग़ और बाग़ान को।।
खोजता हूँ माँ का आँगन, बाग़ और बाग़ान को।।
इन्द्र के दूतों सुनो, यह एक मेरी याचना।
जा रहे उस ओर तुम, मेरी है ये अभ्यर्थना।।
जा रहे उस ओर तुम, मेरी है ये अभ्यर्थना।।
मेरे बचपन की धरा को एक देना सूचना।
याद है मेरी उसे, चाहूँ यही बस पूछना।।
याद है मेरी उसे, चाहूँ यही बस पूछना।।
अमित बंसल
Respected sir I have no more word to explain anything against your poem .....Great Sir
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